Wednesday, January 18, 2012

प्रेम आलिंगन

आज धुंध को सूरज से लड़ते देखा,

ज़िद थी कि नहीं हटूंगी, यहीं रहूंगी|

सूरज क़ी रौशनी भी फिकी पड़ने लगी,

मानो ज़िद के आगे झुकने लगी||


फिर सूरज का धुंधला चेहरा देखा

आनंदमय, करुणामय, रसपूर्ण किन्तु सावधान!

धुंध क़ी चंचलता को निहारता, मुस्कुराता;

मानो प्रिया का नृत्य देखता||


देखा, फिर उनको फुसफुसाते

दिल क़ी बात एक दूजे को बताते|

ना जाने क्या समझौता हुआ

इनका व्यवहार मेरी समझ से परे हुआ||


देखा दोनों को आँहें भरते,

देखा मैंने धुंध को छंटते|

दो प्रेमियों के आलिंगन में

धुंध का अस्तित्व सिमटता गया||


देखा, देखा मैंने सारा दृश्य

पर ना जाने क्या रह गया?

जीत तो सूरज क़ी रौशनी क़ी हुई,

किन्तु चर्चा फिर भी धुंध क़ी रही||