Thursday, December 1, 2011

ग़ुम हूँ मैं

हूँ मैं एक व्यस्त चौराहे पे
पूछता घर का पता जानकारों से,
ना जाने कहाँ ग़ुम हूँ मैं|

हर ओर एक राह, एक गंतव्य है
कुछ भी हालाँकि दूर नहीं,
लेकिन फिर भी कहीं ग़ुम हूँ मैं|

अँधेरा है, कहीं कुछ कृतृम रौशनी भी|

ये रौशनी भी मगर, अँधेरे से कम नहीं
राह दिखाना तो दूर, कुछ छुपाती है ये
इस रौशनी में भी, हाय! क्यों ग़ुम हूँ मैं|

खड़ा हूँ हाथ में मशाल लिए
भटकों को पथ दिखाता, बेफिक्र;
किन्तु कहीं ग़ुम हूँ मैं|

ग़ुम हूँ मैं उन राहों में
जो किसी नक़्शे में नहीं, और
जिस तरफ कोई आता-जाता नहीं
हाँ लेकिन ग़ुम हूँ मैं|